एक लिपि, सभी भाषाओं के लिए
युआन राजवंश (1271–1368) मंगोल साम्राज्य का पूर्वी केंद्र था — यही साम्राज्य इतिहास का सबसे बड़ा अखंड भू-साम्राज्य रहा, पर तब तक फारस से रूस तक फैली पश्चिमी ख़ानतें अलग-अलग शासित हो चुकी थीं। युआन दरबार में ही मंगोलियाई, चीनी, तिब्बती, उइगुर और फारसी भाषाएँ साथ-साथ चलती थीं। 1269 ई. में कुबलई खान ने अपने शाही गुरु, तिब्बती भिक्षु द्रोगों च्योग्याल फागपा (1235–1280) को एक ऐसी लिपि बनाने का आदेश दिया जो इन सभी भाषाओं को लिख सके। परिणाम था फाग्स-पा लिपि (八思巴字)।
लिपि की रचना
फागपा ने तिब्बती लिपि (जो भारतीय ब्राह्मी से व्युत्पन्न है) को लंबवत रूप में ढाला। 41 मूल अक्षरों (तिब्बती और संस्कृत के लिए अतिरिक्त अक्षर जोड़ने पर लगभग 48) की यह अबुगिदा प्रणाली मंगोलियाई, चीनी, तिब्बती, संस्कृत और फारसी ध्वनियों को समेटने के लिए बनाई गई थी। राजमुहर, कागज़ी मुद्रा, शाही फरमान और शिलालेखों पर इसका उपयोग चीन से ईरान तक मिलता है।
विफलता के कारण
चीनी विद्वान हान अक्षर नहीं छोड़ना चाहते थे; मंगोल उइगुर लिपि में माहिर थे। 1368 में युआन के पतन के बाद, फाग्स-पा एक ही पीढ़ी में भुला दिया गया।
हाँगुल से संबंध का अनुमान
1443 में जोसियोन के राजा सेजोंग ने हुनमिनजियोंगुम (訓民正音) बनाया। विद्वान गैरी लेड्यार्ड (1966) ने तर्क दिया कि हाँगुल के अक्षर-खंड और कुछ अक्षर आकृतियाँ फाग्स-पा से प्रेरित हो सकती हैं। किंतु राजा सेजोंग ने स्पष्ट कहा था कि अक्षर उच्चारण-अंगों के आकार पर आधारित हैं।
अप्रत्याशित विरासत
ध्वनि-लिपि होने के कारण फाग्स-पा 14वीं सदी की मंदारिन के व्यंजनों और स्वरों का प्रत्यक्ष प्रमाण देती है, जो हान अक्षरों से संभव नहीं है। केवल स्वर-तान इसका अपवाद है: फाग्स-पा में तान के चिह्न हैं ही नहीं, इसलिए जिन शब्दांशों में अंतर सिर्फ़ तान का है, उनकी वर्तनी एक जैसी होती है; चारों तानें युआन-कालीन तुकांत कोश मंगगू ज़ीयुन (蒙古字韻) में हर वर्तनी के नीचे दिए हान अक्षरों के क्रम से ही पढ़ी जा सकती हैं। कुबलई खान की यह विफल लिपि चीनी भाषा के ध्वनिशास्त्र इतिहास का अनमोल टाइम कैप्सूल बन गई।