अक्षरों का सागर, साक्षरता का मरुस्थल
15वीं सदी के जोसियोन में शास्त्रीय चीनी (हानमुन, 漢文) एकमात्र प्रतिष्ठित लिपि थी। इसे सीखने में कई वर्ष लगते थे — जो किसान, कारीगर और महिलाएँ नहीं दे सकते थे। समाज दो परतों में बँटा था: लेखन पर एकाधिकार रखने वाले पुरुष यांगबान अभिजात वर्ग, और विशाल निरक्षर जनसमूह।
सेजोंग का गुप्त प्रोजेक्ट
राजा सेजोंग (शासनकाल 1418–1450) ने खगोल विज्ञान, संगीत सिद्धांत और सैन्य तकनीक में सुधार किए। 1440 के दशक की शुरुआत में उन्होंने गुप्त रूप से एक छोटी विद्वान-मंडली बनाई (और स्वयं भी संभवतः कार्य किया) और शून्य से एक नई वर्णमाला डिज़ाइन की। 1443 में पूर्ण, और 1446 में हुनमिनजियोंगुम (訓民正音) के प्रकाशन के साथ आधिकारिक रूप से प्रवर्तित।
व्यंजन अक्षर उच्चारण के समय मुखनली की स्थिति का चित्रण करते हैं; स्वर अक्षर तीन दार्शनिक तत्वों — आकाश (·), भूमि (ㅡ) और मनुष्य (ㅣ) — से बने हैं। अक्षर मिलकर अक्षर-खंड बनाते हैं — एक साथ वर्णमाला और दृश्यात्मक रूप से अक्षरात्मक।
विद्वानों का विद्रोह: चोए मानरि का ज्ञापन
1444 में विद्वान चोए मानरि (崔萬理) ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ सेजोंग को औपचारिक विरोध पत्र सौंपा। तर्क स्पष्ट थे: जोसियोन चीनी सभ्यता का हिस्सा है — अलग लिपि बनाना मंगोल या जुर्चेन जैसा 'असभ्य' कार्य है; हान अक्षर हजार साल से काम कर रहे हैं; यदि सामान्य लोग आसानी से पढ़-लिख सकें, तो विद्वान अभिजात वर्ग का एकाधिकार टूट जाएगा। सेजोंग ने बिंदुवार बहस की, फिर चोए को संक्षिप्त कारावास दिया। घोषणा जारी रही।
पहले किसने उपयोग किया
विडंबना यह है कि हाँगुल को सबसे उत्साह से अपनाने वाले वही लोग थे जिनसे चोए डरते थे: महिलाएँ और बौद्ध भिक्षु। यांगबान पुरुष चीनी में लिखते रहे और हाँगुल को तुच्छ (ओनमुन) समझते थे। लेकिन परीक्षा से वंचित अभिजात महिलाओं ने पत्र, डायरी और घरेलू लेखा-जोखा के लिए हाँगुल अपनाया। भिक्षुओं ने इससे सूत्र अनुवाद किए और गृहस्थों के लिए धार्मिक ग्रंथ लिखे।
देशी भाषा के उपन्यास हाँगुल के माध्यम से विकसित हुए — 18वीं सदी का चुनह्यांगजियोन (春香傳) वर्ग-सीमाओं को पार करने वाली निष्ठा की कथा के रूप में राष्ट्रीय पौराणिक कथा बन गया।
लगभग विलुप्ति और पुनरुत्थान
1504 में तानाशाह यियोनसानगुन ने हाँगुल में लिखे व्यंग्य पर्चे फैलने के बाद इसे प्रतिबंधित कर दिया। 1506 में उसके पतन के बाद प्रतिबंध हटा, पर हाँगुल की प्रतिष्ठा सदियों तक निम्न रही। 19वीं सदी के अंत के राष्ट्रवादी आंदोलन ने इसे चीनी सांस्कृतिक प्रभुत्व से अलग कोरियाई पहचान के प्रतीक के रूप में पुनः स्थापित किया — 1894 के गाबो सुधारों ने इसे गुंगमुन (國文, राष्ट्र की लिपि) नाम से सरकारी दस्तावेज़ों की आधिकारिक लिपि बनाया, और 1896 में शुरू हुआ अख़बार तोंगनिप सिनमुन पूरी तरह इसी लिपि में छपा। हाँगुल नाम एक पीढ़ी बाद आया: 1910 के दशक की शुरुआत में जू सिग्योंग और उनके भाषा-सुधारक साथियों ने अपमानजनक ओनमुन की जगह यह नाम गढ़ा, और यह आम प्रचलन में तब आया जब 1927 में हाँगुल पत्रिका छपने लगी। 1945 में स्वतंत्रता के बाद यह दोनों कोरिया की आधिकारिक लिपि बन गई।