उधार से परिवर्तन तक
चीनी लिपि लगभग 4वीं-5वीं शताब्दी ई. में कोरियाई प्रायद्वीप के रास्ते जापान पहुँची। प्रारंभ में जापानी लोगों ने इसे केवल ध्वनि के लिए उपयोग किया — विद्वान इसे मान्योगाना (万葉仮名) कहते हैं। उदाहरण के लिए 「あめ」 (वर्षा) को 「阿米」 लिखा जाता था — अर्थ की उपेक्षा कर केवल ध्वनि ली जाती थी।
अर्थात् क्रांति
लगभग 700 ई. के आसपास — कोजिकि (712) और निहोन शोकि (720) के युग में — एक शांत क्रांति हुई। लिपिकारों ने चीनी ध्वनि के बजाय अक्षर के अर्थ के आधार पर मूल यामातो शब्द ढूंढना शुरू किया। 山 (चीनी: shān) को yama पढ़ा जाने लगा; 水 (shuǐ) को mizu। यही है कुन-योमि (訓読み) — विश्व भाषा-इतिहास में अत्यंत दुर्लभ परिघटना।
यह केवल जापान में ही क्यों बचा?
कोरिया और वियतनाम ने भी चीनी अक्षर अपनाए — और अक्षर को देशी शब्द से पढ़ने का विचार वहाँ भी उठा। कोरियाई लिपिकार शास्त्रीय चीनी पाठ पर सोकतोक गुग्योल (석독구결, 釋讀口訣) के चिह्न लगाते थे, ताकि उसे देशी कोरियाई शब्दों में और कोरियाई वाक्य-क्रम में पढ़ा जा सके; आज भी कोरियाई हांजा का नाम अर्थ और ध्वनि की जोड़ी से बनता है — 水 को 물 수 (mul su) कहते हैं, अर्थात् पानी और उसकी सिनो-कोरियाई ध्वनि। वियतनाम की chữ Nôm लिपि तो और आगे गई: अर्थ के आधार पर अक्षर चुनकर लिखना इतना आम हो गया कि देशी पाठ दर्शाने के लिए एक चिह्न (nháy, 𖿱) ही गढ़ा गया — 本 का सिनो-वियतनामी पाठ bản है, पर 本𖿱 का पाठ vốn। जापान की विशेषता आविष्कार नहीं, बल्कि उसका बचा रहना है: अन्यत्र देशी पाठ शास्त्रीय विद्वत्ता या किसी ऐसी लिपि से बँधा रहा जो चलन से बाहर हो गई, जबकि जापान में वह रोज़मर्रा के लेखन का हिस्सा बन गया और वहीं टिका रहा। जापान ने इस दोहरी प्रणाली को संस्थाबद्ध किया।
मान्योगाना से काना तक
मान्योशू संकलन (लगभग 759 ई.) ध्वन्यात्मक उधार लेखन का उत्कृष्ट उदाहरण है। अन=あ, इ=い, उ=う — ये रूप सदियों में सरल होकर हिरागाना और कातागाना में बदले, किंतु कुन-योमि परत समानांतर रूप से बनी रही।
आधुनिक शब्दकोशों में दिए गए पाठ
अकेले 生 अक्षर में ओन-योमि セイ, ショウ; कुन-योमि いきる, うまれる, はえる, なま — दर्जनों पाठ हैं। ओन-योमि विभिन्न कालों की चीनी भाषा की परतें (呉音, 漢音, 唐音) दर्शाती है; कुन-योमि प्रागैतिहासिक यामातो शब्दावली को संरक्षित करती है। इसलिए आधुनिक मिश्रित-लिपि जापानी पाठ एक साथ कई ऐतिहासिक परतों को दिखा सकता है।