एक कांजी, दो ऑन्योमि पाठ
अधिकांश कांजी में कम से कम दो ऑन्योमि होते हैं: गो-ऑन (呉音) और कान-ऑन (漢音)। 経 को गो-ऑन में kyō और कान-ऑन में kei पढ़ा जाता है। व्यवहार में お経 (सूत्र) kyō का उपयोग करता है; 経済 (अर्थव्यवस्था) kei का।
पहली लहर: कोरियाई भिक्षु
5वीं–6वीं सदी में बेकजे और गोगुरियो के विद्वानों ने जापान में चीनी लिपि पहुँचाई। उन्होंने जो पाठ पहुँचाए, उन्हीं को आज गो-ऑन कहा जाता है — यांग्त्से के दक्षिण में वू क्षेत्र के नाम पर, हालाँकि यह नाम सदियों बाद ही जुड़ा, संभवतः कान-ऑन के पैरोकारों द्वारा। आमतौर पर माना जाता है कि गो-ऑन दक्षिणी राजवंशों की राजधानी जियानकांग (आज का नानजिंग) के आसपास की चीनी भाषा को दर्शाता है, पर किसी समकालीन स्रोत से इसकी पुष्टि नहीं होती, और कोरियाई मार्ग ने इन पाठों को कितना बदला, यह भी स्पष्ट नहीं है। बौद्ध सूत्र, जप और मंदिर प्रोटोकॉल इसी उच्चारण में स्थापित हो गए थे।
तांग प्रतिष्ठा परत: कान-ऑन
7वीं–8वीं सदी में जापानी दूतों (केंतोशी) ने चांगआन का उच्चारण वापस लाया — कान-ऑन — जिसने दरबारी शब्दावली को बदल दिया: 政治 seiji, 文化 bunka, 経済 keizai। लेकिन सदियों पुरानी बौद्ध संस्था ने अपना उच्चारण बनाए रखा।
व्यावहारिक उदाहरण
業 गो-ऑन में gō (कर्म), कान-ऑन में gyō; 極楽 gokuraku (परम सुख) पूरी तरह गो-ऑन; 道路 dōro (सड़क) में 道 गो-ऑन dō है, पर 神道 Shintō में कान-ऑन tō — गो-ऑन रोज़मर्रा के कई शब्दों में भी बना रहा।